पिघलती भावनाएँ: एक सामाजिक कहानी
प्रकाशित: | लेखक: आपकी वेबसाइट का नाम
ठंड का मौसम था, लोग घरों के अंदर अलाव जलाकर ताप रहे थे। कुछ तो बिस्तर में ही कम्बल में लिपटे हुए थे, पर ऐसे ठंडे मौसम में बच्चे कहाँ पीछे रहने वाले थे? गली के किशोर पार्क के मैदान में बैट-बल्ला-गेंद लेकर पहुँच गए थे। लकड़ी के स्टंप गाड़े जा रहे थे, टीम बनाई गई थी, दोनों टीमों के कप्तान चुने गए थे, अम्पायर का चयन किया गया था। टॉस फेंककर दोनों टीमों के योद्धा मैदान में डटकर मुकाबला करने के लिए उतावले हो रहे थे। ऐसे रोमांचक मुकाबले में सपोर्ट करने वाले न हों, भला ऐसे कैसे हो सकता था? छोटे-छोटे बच्चे, बेरोजगार नौजवान अपनी-अपनी टीम के हौसला अफजाई के लिए मैदान में दोनों ओर आमने-सामने बैठकर तालियाँ बजाने के इंतजार में थे। एक टीम का कप्तान कमलेश कुमार था, दूसरा कासिम। कासिम ने पहले फील्डिंग चुनी। कमलेश कुमार के ओपनर बल्लेबाज बैट-बल्ला को हवा में घुमाते, इतराते हुए अपनी-अपनी पोजीशन लेकर तैयार खड़े थे। अम्पायर के इशारे पर बॉलर ने गेंद डाली। यह क्या! पहली ही गेंद पर चौका! मैदान में बैठे सपोर्ट करने वाले “वंस मोर! वंस मोर!” चिल्ला कर तालियाँ बजाने लगे। फिर दो-तीन ओवर तक चौका-छक्के की वर्षा होती रही। स्कोर बोर्ड लगातार आगे खिसक रहा था। विरोधी टीम के सपोर्ट करने वाले मायूस होकर भगवान को स्मरण कर रहे थे। तभी कुशल कप्तान का परिचय देते हुए कासिम ने बॉलिंग खुद ही करने का फैसला किया। यह क्या?
पहली ही गेंद मैदान से बाहर! अम्पायर ने झूम कर हाथों को ऊपर उठा कर छः रन का इशारा किया। समर्थक “कोहली! कोहली!” चिल्ला-चिल्ला कर तालियाँ बजा रहे थे। चार गेंदों में चार छक्के, दर्शकों का मनोरंजन हो रहा था। कुछ तो नाच रहे थे, कुछ विरोधी सपोर्ट करने वाले को चिढ़ाने का काम कर रहे थे। कासिम ने अपने काबिल बॉलर को गेंद दी। पहली बॉल पर ही कमलेश कुमार का साथी एलबीडब्ल्यू आउट। आउट होते ही दूसरे ओर के प्रशंसक झूम कर नाचने लगे। मुकाबला रोचक था। उस बॉलर ने अपने ओवर में दो बल्लेबाजों को पवेलियन लौटा दिया।
अगला ओवर फेंकने की कासिम की बारी थी, सामने कमलेश कुमार। दोनों टीमों के दोनों कप्तान अपनी-अपनी विधा में निपुण। कासिम ने गुगली, धीमी गति, तेज गति सभी का उपयोग किया, पर हर गेंद मैदान से बाहर। स्कोर बोर्ड लगातार अपडेट हो रहा था, दर्शकों का भरपूर मनोरंजन हो रहा था। तभी कासिम की गेंद स्टंपों की गिल्ली उड़ाती हुई विकेटकीपर के हाथों में कैद हो गई। प्रशंसक झूम उठे थे, ताली की गड़गड़ाहट से मैदान गूंज उठा, पर अम्पायर ने नो बॉल का इशारा किया था। बस फिर क्या था! प्रशंसक आमने-सामने डट गए। टीमों के योद्धा आपस में तू-तू मैं-मैं करने लगे थे। बच्चों का झगड़ा गुत्थमगुत्था में बदला, फिर बड़े भी मैदान में डट गए थे। जमकर लात-घूंसे चले थे। दोनों पक्षों ने रपट दर्ज की, मामला कोर्ट-कचहरी में पहुँच गया था। मुहल्ले में लकीर खिंच गई। दस घर हिन्दू के थे, तब पंद्रह घर मुस्लिम। वर्षों का भाईचारा पल में दुश्मनी में बदल गया। सरहद खिंच गई।
कमलेश कुमार और कासिम के पिता इसी गली में जन्मे थे। बचपन से याराना था, एक ही स्कूल-कॉलेज में शिक्षा ग्रहण की थीं। कासिम के पिता अब्दुल का दो-पहिया वाहन सुधरने का गैराज था। गैराज के बगल में ही अब्दुल ने कमलेश कुमार के पिता सुरेश को भी ऑटो पार्ट्स की दुकान डलवा कर अपनी यारी सारे जीवन के लिए पक्की रखी थीं। दोनों परिवारों का घर एक ही गली में पाँच घरों के फासले पर था। ईद की सेवइयाँ सुरेश के घर आती, तब दीपावली की मिठाइयाँ अब्दुल के घर। एक ही धंधा में होने के कारण दोनों का चोली-दामन का साथ था, पर अब यह साथ दुश्मनी में बदल गई थी। जो भी ग्राहक अब्दुल के पास दो-पहिया वाहन सुधरने को लाते, तब वह कल-पुर्जे दूसरी दुकान से मंगवाए जाते थे। कमलेश कुमार के पिता सुरेश से कोई अच्छा मिस्त्री का पूछता, तब सुरेश दूसरे मिस्त्री का नाम बताकर उसके तारीफों के पुल पर पुल बांध कर उसे वही भेजते थे। ऐसे में दोनों की आमदनी पर असर पड़ रहा था। दोनों समझ भी रहे थे, पर मन पर मोटी-मोटी बर्फ की शिलाओं ने कब्जा जमा लिया था!
एक दिन अब्दुल मोटरसाइकिल से बाजार से लौट रहे थे, पीछे से महिला कार चालक ने टक्कर मार दी थी और अब्दुल का एक हाथ-पैर फ्रैक्चर हो गया था। पैर में ज्यादा बड़ा फ्रैक्चर था। ऑपरेशन कराया गया था जो भी जमा पूंजी थी खर्च हो गई थी। पैरों में नट-बोल्ट डाले गए थे, कुछ महीनों तक डॉक्टर साहब ने पैरों पर लोड देने के लिए सख्ती से मना कर दिया था। ऐसे में अब्दुल घर पर बिस्तर पर ही पड़े रहने को मजबूर थे। ऊपर से बड़ा परिवार, पाँच-छः बच्चे, बिजली-पानी का अलग से खर्चा। अब खाने के भी लाले पड़ने लगे थे। घर की परिस्थितियों को देखकर कासिम पढ़ाई छोड़ कर दुकान पर बैठता था, पर ग्राहकों का काल था। जो भी ग्राहक आते, सुरेश दूसरी दुकान पर भेज देते थे। कासिम को सारे दिन में एक-दो ग्राहक ही मिल पाते थे। उससे रहा नहीं गया, सुरेश के पास पहुँच कर बोला, “चाचाजी, आप को तो मालूम ही है घर की हालात, थोड़ा रहम करो।” सुरेश ने कासिम पर तिरस्कार पूर्ण नज़र डालकर कहा, “मियाँ, उस दिन तो बहुत अकड़ दिखा रहे थे, बड़े कप्तान बन रहे थे, और तुम्हारे अब्बा भी बड़े अकड़ दिखा कर तीस मार खाँ बन रहे थे।”
कासिम, “चाचा जी, यह हमारी बच्चों की लड़ाई थी, आप लोगों को नहीं आना चाहिए था।”
सुरेश, “मियाँ, कैसे न आता? अपने अब्बा को समझाना था। सबसे पहले वहीं पहुँचा था लाठी लेकर। झगड़ा उसी का बढ़ाया हुआ था। तुम्हारे अब्बा ही थाने रपट दर्ज करने पहले गए थे।”
कासिम, “पर चाचा जी, मैं अब्बा को समझाने का प्रयास करूंगा। हम भूलकर राजीनामा नहीं कर सकते क्या?”
राजीनामा का सुनकर सुरेश की आँखों में चमक आ गई थी। कौन बार-बार कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगाए! फिर सहसा ख्याल आया कि कासिम तो अभी बच्चा है, क्या पता अब्दुल तैयार हो या न हो। नहीं नहीं, अभी रहम करने में नुकसान ही है। कुछ दिन और रोटी के लाले पड़ने दो, अक्ल ठिकाने आ जाएगी। अभी दूध में उबाल है, उबलने दो। अकड़ कर कहा, “मियाँ कासिम, मेरा टाइम खोटी मत करो। धंधे का टाइम है, मुझे धंधा करने दो!”
कासिम ने हर तरह से हिलाने-डुलाने का प्रयास किया था, पर सुरेश के मन पर जमी बर्फ को पिघला नहीं सका। शाम सुरेश दुकान से आते-जाते, तब अब्दुल पर ज़रूर निगाह डाल कर निकलते थे। अब्दुल घर के बाहर या तो चारपाई पर बैठे दिखते थे या व्हील चेयर पर। उनकी दुर्दशा को देखकर सुरेश को परम शांति मिल रही थी। कभी-कभी ऐसा लगता था कि जैसे जीते जी ही स्वर्ग मिल गया हो। मनुष्य का मन भी बड़ा विचित्र है, जिससे प्यार करेगा तब भी अपने आप को स्वर्ग के नजदीक समझेगा और नफ़रत में भी!
कोरोनावायरस यों तो सारे विश्व में उत्पाद मचा रहा था। चीन, इटली, अमेरिका अनेक देशों से मरने वालों के आँकड़े मीडिया के हवाले से खबर आ रही थी। सरकार ने हर तरह की सावधानी रखी, पर कोरोनावायरस को रोकने में सफलता प्राप्त नहीं हुई। भारत में भी प्रवेश कर गया था। ऐसे में सरकार को अपने नागरिकों को महामारी से निपटने के लिए लॉकडाउन का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। रेल, हवाई जहाज, बसों, टैक्सी, कारें, ऑटो यहाँ तक कि साइकिल, मोटरसाइकिल के पहिए भी थम गए थे। मीडिया के हवाले से लिपस्टिक पाउडर में पुते हुए चेहरे वाली मोहतरमा आँखें मटका-मटका कर नमक मिर्च लगाकर शहर दर शहर, राज्य दर राज्य के आंकड़ों को दिखाकर जनता के मन में भय भरने का अभूतपूर्व योगदान दे रही थी। दिल्ली की हालात ज्यादा ख़राब बताई जा रही थी। सड़कें सूनी पड़ी थीं, कहीं-कहीं आवारा कुत्तों के झुंड दिखाई दे रहे थे और बिन वजह घरों से बाहर निकल कर तफरी लेने वालों की पुलिस का लाठीचार्ज का प्रसाद मिलता था!
गरीब परिवार या तो सरकार के भरोसे पर थे या फिर स्वयंसेवी संस्थाओं के रहमो-करम पर। सरकार और संगठन घर-घर भोजन-राशन पहुँचा रही थी, पर इतनी बड़ी दिल्ली चाह कर भी राशन पहुँचने में एक-दो दिन का समय लग जाता था। सोशल मीडिया पर बहुत सारे विडियो आ रहे थे। कुछ परिवारों को एक टाइम का भोजन ही नसीब होता था, कुछ परिवारों को एक-एक दिन के फाँके पड़ रहे थे।
अब्दुल पर एक्सीडेंट होने से पहले ही मुसीबत आन पड़ी थी, फिर यह कोरोनावायरस का कठिन समय। अब परिवार पूरी तरह से सरकार के भरोसे पर था। बड़ा परिवार होने के कारण राशन जल्दी ही खत्म हो जाता था, तब बड़ों ने एक ही समय भोजन ग्रहण करने का फैसला किया था। फिर रमजान का पाक महीना भी लग गया था। इस महीने का तो बच्चे-बुजुर्ग बेसब्री से महीनों पहले से ही इंतजार करने लगते हैं, पर इस बार लॉकडाउन के कारण त्योहार फीका-फीका लग रहा था। न तो बच्चों में उत्साह था न ही बड़ों में। मस्जिद बन्द पड़ी थी, घर पर ही नमाज़ अदा कर रहे थे। शायद इतिहास में पहली बार मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा बंद किया गया था। शायद भगवान कोरोनावायरस के बहाने कुछ संदेश दे रहे थे, शायद प्रकृति मानव को समझा रही है कि अभी भी वक़्त है, संभल जा, वरना अगला झटका तू सम्हाल नहीं पाएगा, शायद?
कमलेश कुमार के पिता सुरेश दूरदर्शी सोच वाले व्यक्ति थे। “हम दो, हमारे दो” का छोटा-सा परिवार था। फिर हमेशा दो-तीन महीने का राशन सामग्री का कोटा खरीद कर रखते थे। कोरोनावायरस की आहट सुनाई पड़ते ही उन्होंने पाँच-छः महीने का राशन और खरीद कर रख दिया। आस-पास के परिवार को भी कभी-कभी मददगार बन कर अपना पड़ोसी धर्म का निर्वाह कर रहे थे, पर अब्दुल की स्थिति का पता होने पर भी उसके नाम का एक दाना भी देने को तैयार नहीं थे। ऐसे कठिन समय में कमलेश कुमार को अपने बचपन के दोस्त कासिम की मदद करने का बड़ा मन करता, पर पिता की बिना आज्ञा से कैसे? उसने वह भी रास्ता निकाल लिया था। मकान के पीछे गली थी, पहले कासिम को फोन करके बोल देता था, “मैं पापा के सोने के बाद पिछले दरवाजे से बाहर निकल कर कुछ राशन तुम्हारे दरवाजे पर रख दिया करूंगा।” कासिम मना भी करता था, पर कमलेश कुमार अपनी बचपन की दोस्ती की कसम देकर मदद करता रहता। ऐसे ही एक दिन अर्ध रात्रि को कमलेश कुमार राशन का झोला लेकर जैसे ही पिछले दरवाजे के नजदीक पहुँचा, देखा पिता अंधेरे में छुप कर खड़े थे। कड़क कर कहा, “कहाँ जा रहे हो? झोले में क्या है?”
कमलेश कुमार, “जी जी कहीं नहीं।”
पिता, “फिर तुम्हारी ज़ुबान क्यों लड़खड़ा रही है? जवाब दो!”
कमलेश कुमार घबराहट में कुछ भी जवाब नहीं दे पा रहा था। शोरगुल सुनकर माँ भी जाग गई थी, बत्ती जलाई गई। देखा झोले में चावल, दाल, आटा भरा हुआ था। पिता, “अच्छा तो यह है सच! सच-सच बताना, किसके लिए ले जा रहे हो?”
कमलेश कुमार, “पिता जी, कासिम के घर। उनके घर कुछ भी नहीं बना है। कृपया मुझे जाने दो।” कमलेश कुमार रोने लगा।
पिता सुरेश कुछ क्षण विचार मग्न रहे थे। फिर उन्होंने कहा, “ठहरो, मैं भी चलता हूँ, ज़रा मास्क लेकर आता हूँ।”
कुछ देर बाद पिता-पुत्र दोनों ही अब्दुल के घर पर थे। कमलेश कुमार ने राशन का झोला रखा था और सुरेश जी ने जेब से नोटों की गड्डी निकाल कर उसी राशन के ऊपर रख दी। अब्दुल के आँखों से अश्रु धारा बह रही थी। हाथ जोड़कर कहा, “मैं तो माफ़ी माँगने का अधिकार भी नहीं रखता। सारा झगड़े की जड़ मैं ही हूँ। बेवजह बच्चों के झगड़ों में उलझ गया था। भाई, मुझे माफ़ कर दीजिए। ऊपर वाले ने मुझे दंड दे दिया है.” सुरेश ने जवाब दिया, “कोई बात नहीं, गलती इंसान से ही होती है। का भूला भटका अगर शाम को घर वापसी कर ले, तब भूला नहीं कहलाता। और हाँ, इन पैसों से बच्चों के लिए कपड़े खरीद लेना और चिंता मत करना। अभी तेरा यार जिंदा है, सब कुछ ठीक हो जाएगा। जब तक तू दुकान जाने लायक नहीं होगा, तेरे परिवार की जिम्मेदारी मेरी। तुझे पहले से ही ईद मुबारक!”
दोनों परिवारों के मन में जो बर्फ जम गई थी, वो पिघल गई थी!